अध्याय 76

मैं दरवाज़े से टिक गई, उँगलियों के पोर बर्फ़ जैसे ठंडे थे। फ़्रेय्या के साथ हाथापाई में मेरी कोहनी छिल गई थी, और अब दर्द धड़क-धड़क कर रहा था। मगर जिस्म की थकान से भी ज़्यादा, दिल की थकान ऐसी थी जैसे ज्वार उठकर मुझे डुबो देने वाला हो।

जेम्स बस वहीं खड़ा रहा। उसके आसपास की हवा बोझिल और डरावनी थी। उसक...

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